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मेरा जेहन-ओ-चेहरा अखबार हो गया

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ये गम-ए-रोजगार से लाचार हो गया मेरा जेहन-ओ-चेहरा अखबार हो गया
लादे फिरता हूँ मै जख्म पुरे पीठ पर मिसाल-ए-दोस्ती का किरदार हो गया
तरक्की पसंद सरकार  मेरी सरपरस्त अब तो भूख रोज़ का बाज़ार हो गया
शौक़ और जरूरत के फासले कम हुए आदमी नियत से ही बीमार हो गया
अनार के दरख्त से भरा ये गाँव मेरा कबका नागफनी का तरफदार हो गया
अपने किरदार पर गरूर है ’नादाँ’ मुझे दर्पण दिखाने का जो तरफदार हो गया

कुछ शेर ...............

मजबूर के अश्क का मुद्दा पहले

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हम कुछ नये गम की बात करें मेरे उस हमदम  की बात करें
आईना देख क्यूँ पूछती है आँखे क्या इस चश्मेनम की बात करे
हर हिजाब के पीछे इक पत्थर किस इक सनम की बात करें
जीने का सलीका ज़रा सीख लें फिर हम मरते दम की बात करे
मजबूर के अश्क का मुद्दा पहले फिर आबे जमजम की बात करें
शिफ़ा अता करना मजबूरी उसकी उससे जरा दम-ख़म से बात करे
सियासत जब सैकड़ों सांप सा डसें   किसके जुल्फों ख़म की बात करे

इस दौरे निजाम में दवा क्या और जहर कैसा

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हमारे लिए यूँ भी  ये रात क्या और दोपहर कैसा
आवारा फ़कीर है कोइ गाँव क्या और डगर कैसा
चिराग़ है पर यह दोस्ती है आँधियों और तूफानों
मुफलिस है हमसे सियासत क्या और जर कैसा

वफ़ा के एवज में जफ़ा मुकम्मल करते लोग है
हुश्न के इस दौर को गाँव क्या और शहर कैसा

यह इस्तफाक है या किस्मत की कारसाज़ी है
उजड़ना ही है जब  आँगन क्या और घर कैसा

मुफलिसों की लडकी या उजड़े मकां फर्क क्या
सियासतदां की नियत क्या और नज़र कैसा

मुख्तलिफ़ सी बात है मिरे  सितारें वफ़ा करें
इस दौरे निजाम में दवा क्या और जहर कैसा

नज़र से गिर के अबके उस दामन में रह गया
अश्क हूँ मेरी मंजिल क्या और कोइ सफर कैसा

कमबख्त नजर है आशिक की अब सबर क्यूँ
फिसल ही गई तो रुख्सार क्या और कमर कैसा

आदमी और कविता

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वो
आम आदमी था
कविता लिखता था
कविता सुनता था,
पढ़ता था
कविता ओढ़ता बिछाता था
एक दिन
वह काठ का हो गया
जिस दिन
उसे पूरी तरह पता चला
ये दुनिया अंधी है
बहरी है
बिना हाँथ पैर वाली
दो मुह वाली
बेहिसाब
सपोले पैदा करती
अंधा सांप है
......


आज ये रंग-ए-अश्क कुछ जाफरानी है

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उसके काँधे सर रखरोना शादमानी है आज ये रंग-ए-अश्क कुछ जाफरानी है
हम तकल्लुफ़ करते रहे वो है की दगा हम पामाल अपने ईमां की निभानी है
ये फ़ुरसत का फ़लसफ़ा लिखते लोग है इन्हें कब रोटी रोज की रोज कमानी है
बगावतों के अमीनो की नस्ल है हम हमें पत्थर में फसल-ए-आग लगानी है  
वो हक़ और पसीने के खिलाफ ही रहेंगे जिन्हें गुलाम जेहनों की कौम उगानी है
मोहब्बत इस दुनिया की देख ली हमने अदावत की शिद्दत भी कुछ आजमानी है
मुखालिफ़ हो शहर की रवायत जब ‘नादां’ ईमान की बात करना बड़ी बेईमानी है

रोटी-ओ-इन्साफ को तरसती कौम हम

हर सांस में जिसके लगे दांव हो जिनके सीने में जंग के घाव हो जिसे ना हो किनारों की हसरत अब के वही सवार मेरी नाव हो


इब्तिदा और इन्तिहाँ के फासले है बहुत दो लफ्ज में वो किस्सा तमाम करते है
किस जानिब इस कदर मजबूर है जो उस काँधे सफ़र का एहतराम करते है
रोटी-ओ-इन्साफ को तरसती कौम हम अर्जी-ओ-सजदे में सुबहो शाम करते है
इस दुनिया से अलहदा फितरत हमारी हम इस दौर को दूर से सलाम करते है

चंद शेर .......

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मेरी प्यास इक नदी से बड़ी है तू सावन है किसी ने बताया मुझे
पांवों छालों की बरात लिए फिरते है लोगो हम आसमान के तारो का हिसाब मत पूछो हमसे

हमारे दामन पर वक्त की खाराश गिन कर कभी काँटों ने भी हमसे उलझाना मुनासिब नही समझा

तेरे इन्कार-ए-वफा की वहशत देख रौशनी से लडती रही है मेरी परछाई

मेरे सदाओं में लफ्ज़ की सूरत तुझे पुकारे तो किस सुरत बता

खुद को फरेब देने का हुनर हमसे सीखें कोइ गैरों को फरेब देना इस दुनिया का हुनर है

नर्म लफ्जों के घावों के कायल हम नही खुल कर जज्बात यूँ दिखाया करो कभी

तेरे गम ने न रख्खा बे-सहारा मुझको

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तेरे गम ने न रख्खा बे-सहारा मुझको  ये बात और है कब मैंने पुकारा तुझको शबनम की बूंद सा कुछ पल चमकूंगा सूरज ने जब तक ना निहारा मुझको  
बग़ावत करेगी अब दरिया किनारों से उस सावन ने किया ये इशारा मुझको
दरख्तों के जिस्मों में खुदे नामों सा इस दिल में मैंने यूँ है उतारा तुझको
तेरे बज्म में मेरे अशआर थम जाए अता कर कभी तो ये नजारा मुझको  
उम्मीद-ओ-वफ़ा में तमाशा बनाकर 'नादाँ’ हर दर्द ने एक दर्द सा उभारा मुझको

चार पंक्तियाँ

वो आँखों में मुस्कान लिए फिरते है मेरी मौत का सामान लिए फिरते है हंथेलियों में तलाशा करते है वो नादाँ हम पेशानी में ईमान लिए फिरतें है
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'नादाँ' अपनी आवारगी को बड़ा मुनासिब पाया 
ना कहीं दिवार खड़ी की ना कहीं घर बना पाया

हमने फूलों को उगलते जहर देखा है

होश में आये तबसे बस सफर देखा है मेरी आवारगी ने कब मेरा घर देखा है
सापों का फ़न  लुट लिया सियासत ने हमने फूलों को  उगलते जहर देखा है
जिसने दुनिया की कमीनगी नही देखी उस बच्चे को मुस्कुराते हर सहर देखा है 
सुब्ह का उजास ना शाम सुरमई देखी मेरी आँखों ने रिज्क का दोपहर देखा है
टूट शाखा से दुनिया खत्म नही होती पत्तों को भी उगातेनया शज़र देखा है
इंकलाब का मतलब-ओ-असर वो जाने जिसने भूख से सुलगता मंजर देखा है
हमसे जिरह करते वो नही थकते ‘नादां’ जिसने सर की छाँव लुटते अम्बर देखा है

खुदा का पता क्या पूछ लिया बड़े बेईज्ज़त निकले मैखाने से

हम खींचे है कमान जमाने से
वो  मुब्तिला है आजमाने में 

तमाशाई में हमारा मुकाबिल कौन आग लगा मशगुल है आशियाने में 

एक बार आकर यूँ ठहर जाओ क्या रख्खा है यूँ आने-जाने में 

गर्मिये इश्क में ये सिलसिला रहे तू रूठता रहे हर बार मनाने से 

इश्क में दस्तूरे ज़फा मुक्कमल है क्या होगा मेरे एक निभाने से 

खुदा का पता क्या पूछ लिया बड़े बेईज्ज़त निकले मैखाने से 

अपनी पे हम है ये दुनिया क्या फर्क क्या इसके माने न माने से 

सवाल बवाल है फकीरी में ‘नादां’ सियासतदां लगेंगे तुझे मिटाने में