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गज़ल - जो नब्ज थामे चारागर बने थे ‘नादाँ’

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वो रूठे हमसे, अब उफ़्क हो गए मेरी साँसे कुछ यु अबस हो गए

इस शहर के बच्चे बड़े क्या हुए गुस्ताखियाँ उनके अदब हो गए

कांटे बने  मासूमियत के निशाँ कुदरत के फैसले अजब हो गए

गमदीदा शहर, अखबार हुए लोग हासिये के खबर भी गजब हो गए

सियासत ने खेले  शतरंजी खेल आंसु भी आँखों में जज्ब हो गए


जो नब्ज थामे चारागर बने थे ‘नादाँ’ वही तेरी ही बिमारी के सबब हो गए

gazal - आग में दहकती गरीबों की बस्ती है, वजूद-ए-नादाँ

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आशिक़-ए-आफताबहूँ, बुझते शोलो से डरना क्या तूफान सी जिद हमारी, उस दिये का ठहरना क्या
थोड़े  सपने, कांटे और पांवो के  छालों का हिसाब राह-ए-शौक में अपनी ही, खताओं से मुकरना क्या
फ़र्क क्या करूँ, तेरी रहमत या सज़ा  का ऐ ख़ुदा इस दुनिया में ठहरना क्या दोज़ख से उतरना क्या
नीयत-ए-हाकिम की साजिशे जब लाजमी है दोस्त मेरे घर की दीवारों का ठहरना क्या, बिखरना क्या
फ़ाक़ाकशी को हमने शौक का लिबास दिया है रब फांकामस्त शक्लों का संवारना क्या निखरना क्या
आग में दहकती गरीबों की बस्ती है, वजूद-ए-नादाँ इसके गलियों में ठहरना क्या, इससे गुजरना क्या

गजल - इतनी रौशनी काफी है या दिया ले आउंगा मै

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अजब  है  पर ये  तेरा  अज़ाब, है  मुझे अज़ीज़
अज़ल तक तेरी ये आशिकी ले जाउंगा मै 
मेरे अश्क  के असरार क्यों  पूछता मुझसे अबस इन आँखों की नरगिसी दे जाउंगा मै
पाबंद हूँ परस्तिश का, उस पारदारी का नही फिरदोस में भी फैज़-ए-फ़सल बो जाउंगा मै
बेकस, बेख़ता, बेकुसूर मेरे बयान है. बेबस  बेगुनाही है खता मेरी, सादगी दे जाऊँगा मै
आग लगा घर पर मासूमियत से पूछता ‘नादां’ इतनी रौशनी काफी है या दिया ले आउंगा मै

ग़ज़ल - हर सिम्त गम-ए-गम में ‘नादाँ’ संदल-संदल

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गुंचों ने खिल के, आग लगा दी बहार में उसने पूछा कैसे, मौसम होता है प्यार में
वो आज भी ना आयें  मौसम-ए-बहार में मजा तो है बस इस बेकरार, इन्तजार में
मासूम फितरत है मेरी, वो बुत संग-दिल तबाही मुकरर है तब मजा कहाँ इन्कार में
शाने में सर उसका उंगलियों में जुल्फे ख़म बड़ी शिद्दत की बेकरारी भी है इस करार में
हूबार है या जलजला उसका अंदाज-ए-इश्क सांस धड़कन, ख्वाब गर्त उस के रफ़्तार में
झुकी आँखे उठे क़यामत का असर रखती है उसे भी मजा है क़त्ल से पहले इन्तजार में
हर सिम्त गम-ए-गम में ‘नादाँ’ संदल-संदल हम है बंदगी है नशा है फ़क़त इस खुमार में  जयनारायण बस्तरिया 'नादाँ'

ग़ज़ल - कुछ मासूमियत कुछ ख़ुराफ़ात

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ये आवाम यूँ ही फिजूल, भूख को बदनाम करती है वज़ीरां-ए-वतन सियासत में सुबह-ओ-शाम करती है
हमारे जख्मी यकीं पे, गौर ना करो तुम सियासतदां हमारी बेबसी, लाचारी तुम्हे, झुक एहतराम करती है
अब्र-ए-दहशत आ तुझसे दावत है, मेरे आसमान की फिर ना कहना मेरी बुजदिली मुझे बदनाम करती है
जुनूं-ए-मोहब्बत है मुझे, जुनूं-ए-वतन भी मेरे नशों में   ये अखबार ये दुनिया फिर भी मुझे गुमनाम करती है
अजबसीकारसाज़ीउनकी, उस पर मेरा मुद्दा-ए इश्क कभी मुहब्बत कभी अदावत, तजुर्बे  नाकाम करती है
लाख सम्हाले ना सम्हले ये दिल उनसे, उनका ‘नादाँ’ उसकी मासूमियत कुछ ख़ुराफ़ातमुझे सरेआम करती है
जयनारायण बस्तरिया ' नादाँ '


ग़ज़ल - मेरी कलम की खामोशी का एहसास है मुझे

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मेरी कलम की खामोशी का एहसास है मुझे
आज भी तेरा नाम लिखने पर ठहर जाता है
जज्बात  छुपाने का जज्बा, बेहद है मुझमे
जिक्र तेरा आने पर तमाम बिखर जाता है
यादे आ ठहरती है  इन आँखों के कोर पर मेरा चश्म-ए-नम शबनम से संवर जाता है
किस्मत के साजिशो  का नाम है ये दुनिया वो मिले, ना मिले यह सोच सिहर जाता है
बेकली, बेजारी, मुफलिसी, उस पे तेरा गम मेरे रहन से जो चाहे, बेखौफ गुजर जाता है
तुझ में कुव्वत है चाहे, बिसात उल्ट दे”नादाँ” बेबसी तेरी सियासत- दाँ- ख़ुदाओंसे डर जाता है

कविता - बाओबाब का पेड़ हूँ मै

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जंगल चीख नही सकते
जंगल चीख रहे हैं सदियों से 
हाँ तूम सुन नही सकते
तुम्हारी ज़रुरत से ज्यादा उंची
तुम्हारी लालच की दिवार फान्द कर
आवाज़ तुझ तक नही पहुंची
तुम्हारी लालच का दावानल की तपिश
जंगल के बुटे-बुटे तक फैला है
जंगल को बुटे-बुटे को मालुम है  तेरे नाखुन जंगल जडों के नीचे तक धसें है
तुम्हारे दांत हर तने मे घुसे हैं चुसतें है पुरी तल्लीनता तना-तना ,पत्ता-पत्ता ,बुटा-बुटा
तुम्हारा यह आनन्द तिरेक
तुम्हारे ह्र्द्य घात का कारण बनेगा
तुझे ओसद देकर गरल पान करते हम जंगल
तु लीलना चाह्ता है अपने ही फेफडे को अपने इक-एक सांस को  जंगल के पास एक दर्पण नही है
दिखा सके तुझे
तेरे व्यापार के शब्दों के चेहरे को
जंगल रोना चाहते हैं
अच्छा हुआ तुमने जंगल को कान्धा नही दिया रोने के लिये
तुम्हारे कान्धे पर फफोले पड जाते
पर देखना एक दिन
हम जंगल एक दिन तुझे कान्धा देंगे
समझ ले हम जंगल तुझ से पहले से हैं तेरे बहुत दिनो बाद भी रहेंगे इस धरती पर
बाओबाब का पेड़ हूँ मै 
सुन कुल हन्ता 
मै ही तेरा पूर्वज हूँ तेरा पुरखा हूँ

गज़ल - वो जो कातिब है तेरी किताब-ए-जिन्दगी का ‘नादां’

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जुगनुओ की साजिश का शिकार, इक मै ही नही 
रात का पता लिए सूरज भी, सारा दिन चलता रहा

मै सिलता रहा भूखी अंतडियों पर सुखी रोटियाँ 
फितरत-ए-रोजगार चेहरे पर चेहरा बदलता रहा 

ज़ाहिर है वो ज़हीर नही, फिर ये तकल्लुफ़ कैसा 
किस्सा ए वफ़ा सुन, रफ़्ता-रफ़्ता पिघलता रहा 

मुफलिसी, जरूरते, मजबुरियाँ, बस सकून नही
ठोकरें मिलती रही, मै गिरता रहा संभलता रहा 

सियासतों का शहर ये, ये साजिशो की गलियाँ
रोटी पर तर्जुमा होते रहे, मै बेबस उबलता रहा 

वो जो कातिब है तेरी किताब-ए-जिन्दगी का ‘नादां’
अबस अब्तर कभी जिल्द कभी पन्ने बदलता रहा 

जयनारायण बस्तरिया 'नादाँ '