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ग़ज़ल - बहर छोटी हो या बड़ी शेर में तासीर हो

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इश्क में हुश्न का रूठना-मानना रह गए रोजी-रोटी रह गई रोना-रुलाना रह गया

दिल बहल जाता तेरे महफ़िल में मगर हम उठ गए बस दौरे-ज़माना रह गया
इश्क और हुश्न के दरम्यां अब क्या रहा रिश्ते तमाम हो गए आना-जाना रह गया
उड़ना चाहा जो उस उफ़क से आसमां तक जहाज उस पंछी का ठौरो-ठिकाना रह गया
कब्र पे मेरी वो जो डाल आये थे कभी वो चादर झीनी हो गई ताना-बाना रह गया
बहर छोटी हो या बड़ी शेर में तासीर हो अब के फ़कत लिखना-लिखाना रह गया   

ग़ज़ल - मुकद्दर मेरा मुझे यूं ही बदनाम करती है

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मेरी आवारगी मेरी आदत नही मेरे दोस्त मुकद्दर मेरा मुझे यूं ही बदनाम करती है

मेरा इश्क दफ्न है मजबूत सीने में मेरे उसकी आँखे मुझे बेसबब सरेआम करती
क्या देखती है वो आँखे जागती ख़्वाबों में सोचती क्या है गालों को ज़ाफ़रान करती है
बड़ी मुहजोर है ये बारिश ये लरजती हवाए बेसाख्ता उन जुल्फों को गुलफाम करती है
हम कलंदर है हमें फ़कीरी मुबारक ‘नादां’ रहती दुनिया को ये दूर से सलाम करती है

ग़ज़ल - मुझे भी संकुं रहे मै तंगदिल ना हुआ

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वो दोस्ती  के कभी काबिल ना हुआ जिसे वक्त पे खंजर हांसिल ना हुआ 
जिस काँधे का बहुत भरोसा था मुझे वही मेरे जनाजे पे सामिल ना हुआ
चलो कुछ इल्जाम मै भी मान लेता हूँ मुझे भी संकुं रहे मै तंगदिल ना हुआ 
मेरे रहन में जमा तमाशाबीन भीड़ थी वही कहते है यार ये महफ़िल ना हुआ 
अदावत करता रहा पूरी जिंदादिली से दोस्तों की दोस्ती में गाफ़िल ना हुआ  
पंख फैलाये जो आसमां से उफ़क तक मेरा वजूद वो इक अबाबील ना हुआ

गज़ल - पर भुख की जुबान पर ताले है

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वक्त ने छीने हमसे निवाले है साजिश सबके सब देखे भाले है
मेरे ही  पाँव  सिर्फ मत देखो पगडंडी के चेहरे पे भी छाले है
रात जिसने रौशनी बेच खाई सुबहा वही ढूंढे नए उजाले है
वफ़ादारी पर बहस करने वालो तुमने आस्तीनों में सांप पाले है
हमारी मजबूरियां कायर नही है पर भुख की जुबान पर ताले है

वक्त की साजिश ने रोक रक्खा वरना इस खून ने लावा उबाले है
उसके हुनर पर सवाल बेमानी है ‘नादां’ कांटे से चुभे तीर निकाले है

गज़ल - लज्ज़त-ए-दर्दे निहां भी पूछो हमसे

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वो मुस्कुरातें है  हर  गुनाह  करके लुत्फ़ जो लेते है मुझे तबाह करके

हम बिस्मिल  है दर  पर उनके  ही वो गुजरे तो बस इक निगाह करके

वो कातिल  हैं हम कुछ  गाफ़िल है हमें तसल्ली है यूँ भी निबाह करके
बेपर्दा होंगे  वो गैर की महफ़िल  में इस अंजुमन से गए यूँ आगाह करके

लज्ज़त-ए-दर्दे निहां भी पूछो हमसे जख्म वो कुरेदे है  आह-आह करके
तसल्ली देने को क्या आये वो 'नादां ' मेरा नींद-ओ-चैन ले गए उगाह करके

कविता - भुख एक कविता

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भुख एक कविता  ..............जब-जब भूख गलती है
तब जिंदगी सांचे में ढलती है
ओ सुविधा के जारज ओलादों
तुम मोम से, 
तुम क्या जानो
मीठी-मीठी थकान और धुप, पसीना
जब कल के उम्मीदों के गोद में तिरती है
ठंड और धुंध में जलते अलाव सी
धुंए में घुमकती बिखरती है तब-तब भूख मचलती है   तुम मोम से  तुम क्या जानो