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ग़ज़ल - या इश्क ने अब अपनी सूरत सियाह कर लिया

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उनके शौक़ के लिए खुद को तबाह कर लिया खुदा ना बन जाए सोच कुछ गुनाह कर लिया
वो जुल्फे सँवारे फिर अंगड़ाई ले या मुस्कुराए क़यामत के पहले, शहर को आगाह कर दिया
नजर ना लग जाए मेरे जुनून को नाकद्री की यही सोच हर हंसी के बाद एक आह भर लिया
हुश्न की सूरत ओ सीरत के फासले बढ़ने लगे या इश्क ने अब अपनी सूरत सियाह कर लिया
दोस्तों की दोस्ती से तंग आकर अब 'नादाँ'
दुश्मनों को अब हमने खैर-ख्वाह कर लिया

ग़ज़ल - ज़िद है अब हर ज़िद से टकरा कर देखेंगे

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जब अँधेरे ढक रहे सूरज के उजाले को आओ एक नई रौशनी उगा कर देखेंगे
पुर्ननवा पत्तों को जब जला रही ये हवा आओ अपने साँसों से महका कर देखेंगे 
उग रहा है  साज़िशो का जंगल वतन में चलो जज्बे का दावानल जला कर देखेंगे
निज़ामे-मुल्क संवार नही सकते किस्मत अब अपने हांथों की लकीरे बना के देखेंगे
बद्दुआ देना हर मसले का हल नही ‘नादाँ’ ज़िद है अब हर ज़िद से टकरा कर देखेंगे