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कविता - आखिर कब तक ?

आखिर कब तक ?
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अनियंत्रित
भावनाओं का उताप ओर कितनी बार पुनरावृतियां अप्रतिहत स्वरों की टंकार से अप्रतिहत स्वरों की गुजानों से झरते स्मृतियों के सुखे पत्ते की गुजरे असंख्य बसन्त के पग-पग , पल-पल प्रतिध्वनियां और कितनी बार बन पखेरूओं के परों की सरसराहट, हल-चल स्व-स्खलित होती भावनाओं का उताप
बह रहा है या तेरे स्वर नाद का अक्षय कोष विदोलित हुं और कितनी बार मेरे चारों दिशाओं को भेदने यह यायावरी - यायाति निनाद कुछ-कुछ बैलाडिला श्रंखला की ढलानों पर उतरते कोहरे पर या तेरे धाविल दहकते दाडिम से कपोल पर ठहरी अजानी ओस की बुन्दे अंगार और ओस सब कुछ तो है मेरे चारो ओर यथावत यत्र-तत्र, सर्वत

कविता - एक भीड की प्यास

सुनो बाबुजी,
सुनो बाबुजी हम देश नही है हम देशवासी नही है हम एक बडे जमीन के टुकडे में सदियों से चल रही शोक सभा में बैठी भीड है ह्मारे जांघों के उपर तक चढी सीड है जो हमारे अन्दर आग पैदा होने नही देती तुम दावे बडी-बडी करते हो हम पर ... जबकि असलियत यह है की हमारे अन्दर की पौरुषता दिवार पर टंगी वयस्क फिल्म की पोस्टर हो गई है जिसके निचले हिस्से पर एक हिजडे ने एक मुस्कुराया पान खाकर थुक दिया है थोडी दुर पर वह गान्धार की तरफ मुँह कर संसद के सामने ब्रिटिश कालीन लैम्प पोस्ट के उजाले पर कोक शास्त्र पर चर्चा करने में व्यस्त है ना सोचे कविता मे अजीब विन्यास है मेरी जुबान पर दुनियावी व्याकरण की खराश है तुम कह सकते हो यहबकवासहै; यहएक

कविता - बस्तरिया खुश है ?

चित्र
सुखी कौन है
बस्तर में
सुखराम,बुधराम, नडगु या ?
प्रश्न वस्तुनिष्ट है
उत्तर जरा गरिष्ठ है
नही लम्बी फेहरिस्त है
सच तो ये है यार
बस्तर में सुखी है खुश है
अफसर,ठेकेदार.पत्रकार
या खादी के तरफदार
बस्तरिया
दो रूपये के चांवल में
खुश है
मॅुह बन्द है,
ऑख बन्द है,
दिमाग का उपयोग करने मे दण्ड है
कटते सागौन

कविता - महुये के फूल

महुये के फूल
साल के फूल
महुये के फूल
तुम्हे खिलना है अनंत तक
मेरे बस्तर में
जरुरत नही गुलाब, चम्पा, मोंगरा तुम्हारी
जिसे लगाना था गुलाब
मेरे बालों में
वह शराब पी कर
मुर्गा बाज़ार में पडा है
आज बाज़ार
कल बीज पंडुम(आम की फसल का त्योहार),
परसों करसाड(मेंला)
उसके बाद बासी तिहार
हप्तों ऑखें और होश नही खुलेंगे
चम्पा, चमेली, मोंगरा के फूल
उम्मीद मत रखना मुझसे
मै तुम्हे सिर में लगाउंगी
झरोखे से इठलाउंगी
गागर सर पर रख

कविता - जाहिर है हुसैन

जाहिर है हुसैन
(कला के बहाने पत्रिका में बहुत पहले एक कविता पढने के बाद आज)

जाहिर है हुसैन
तुम्हारे बनाये चित्र
करोडों के है
जाहिर है हुसैन
तुम्हारे बनाये गये चित्रों में घोडे है
मर्दानगी के प्रतीक
माधुरी यौवन का प्रतीक है
जे जे स्कुल ऑफ आर्ट
ने तुम्हे चटक रंग
विस्तृत स्ट्रोक
वह 1935 की बात थी
अब तक
गुलामी रंगो मे ढल रही है
तुमने चित्रो में
टेरेसा, लता मंगेशर, इंदिरा
सुफी फना, बका, क़्वाफ
सभी है
जाहिर है हुसैन
तुमने इतिहास में जाकर देखा है
फैज़, गालिब के पास पुरे कपडे थें
प्रजा हिन्दु थी या मुसलमान