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खुदा का पता क्या पूछ लिया बड़े बेईज्ज़त निकले मैखाने से

हम खींचे है कमान जमाने से
वो  मुब्तिला है आजमाने में 

तमाशाई में हमारा मुकाबिल कौन आग लगा मशगुल है आशियाने में 

एक बार आकर यूँ ठहर जाओ क्या रख्खा है यूँ आने-जाने में 

गर्मिये इश्क में ये सिलसिला रहे तू रूठता रहे हर बार मनाने से 

इश्क में दस्तूरे ज़फा मुक्कमल है क्या होगा मेरे एक निभाने से 

खुदा का पता क्या पूछ लिया बड़े बेईज्ज़त निकले मैखाने से 

अपनी पे हम है ये दुनिया क्या फर्क क्या इसके माने न माने से 

सवाल बवाल है फकीरी में ‘नादां’ सियासतदां लगेंगे तुझे मिटाने में

लुट चुके जो उनकी की शरारत और सियासत में

दिल तो है दिल........

दिल तो है दिल.........

दिल लगा के बेदिली का मज़ा कुछ और है
इस इश्क  में  बेकली का मज़ा कुछ और है
वो ना-ना करते  रहे  मैंने  लब  चूम लिया
इश्क में हुक्म-उदुली का मज़ा कुछ और है

अगज़ल- मेरा बस्तर

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सहमा-सहमा सा मेरा शहर है जंगल भी खून से तरबतर है
चिड़िया गूंगी बहारे बे नजर है   क्या यही मेरा हसींन बस्तर है
सूरज भी जब सहसा खामोश है धुवां-धुवां सा ये सारा मंजर है
मुद्दा क्या है हुक्मराँ सब जाने मजलूमों के हिस्से बस कहर है
कौन रखता है सोच में बारूद कौन देता जलजलों को खबर है
किस किस ने किरदार निभाये किस-किस ने खोपा खंजर है
यहाँ के नमक का किस पे असर है ये जमीन जानती इसे सब खबर है
अजब उसूलों के किताबात है जो उगाता वो भूख के नजर है
इन बदनियतों के सब बे-असर है साहब है पैसा है ना कोइ कसर है
अगर है मगर है सबकुछ जबर है लाशे बनाती सियासत की डगर है
इतने सवालात अब क्यूँकर ‘नादाँ’ मेरा बस्तर भी क्या अब बस्तर है

मेरी बेकली पे कुछ सवालात करो

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गजल - हर दर्द का कुछ बेदर्दी से मज़ा लेना

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