गज़ल - जो नब्ज थामे चारागर बने थे ‘नादाँ’

वो रूठे हमसे, अब उफ़्क हो गए मेरी साँसे कुछ यु अबस हो गए सा- जिप्सी इस शहर के बच्चे बड़े क्या हुए गुस्ताखियाँ उनके अदब हो गए कांटे बने मासूमियत के निशाँ कुदरत के फैसले अजब हो गए गमदीदा शहर, अखबार हुए लोग हासिये के खबर भी गजब हो गए सियासत ने खेले शतरंजी खेल आंसु भी आँखों में जज्ब हो गए जो नब्ज थामे चारागर बने थे ‘नादाँ’ वही तेरी ही बिमारी के सबब हो गए