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उनसे ना करो यूँ ईमान की बातें

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खोल पंख करो  उड़ान की बातें कुछ तीर कुछ कमान की बातें दोस्त कौन आस्तीन का दुश्मन कुछ करो अब पहचान की बातें जो सियासत और बयान उगाते उनसे ना करो यूँ ईमान की बातें बोकर आँगन में फसल-ए-आग करतें हैं जो  समाधान की बातें मैदान की हर हवा पे यूँ भरोसा क्यूँ करते हो बदगुमान सी बातें  अब जंगल की दावानल से दोस्ती क्यूँ करतें हो यूँ “नादाँ” सी बातें

तुझसे क्या कहूँ ..........

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साभार मेरी बर्बादी भी यूँ मेरे लिए जश्न है 'नादा उसने कुछ तो मेरी इबादत को नज्र किया *** किस भरोसे सफ़र का अंजाम करोगे नादां  तेरे रहनुमां ही तेरे  राह के पत्थर बन गए *** वक्त के सैकड़ों इम्तहानों की सिला है'नादाँ'  हमें भी ठोकरें खाने की  ये अदा आ ही गयी  *** हंगामा ये है  हमारी आदतें शहर से कुछ जुदा है  तहजीब-ए -इंसा यहाँ रस्मों रिवाज़ की बात नही . *** गुजरे दिनों के हर कसक की तसल्ली के लिए  आज भी तेरी गली का फेरा अंजाम कर लेते हैं

तेरी वहशत मुझे बहलाती है

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दिल रोता आँखें मुस्कुराती है जिन्दगी कितना आजमाती है इश्क या रोटी यूँ  ही बेसबब हर सांस, भर सांस रुलाती है मेरी मुफ़लिसी है सारा मुद्दा फिर दुनिया किसे निभाती है वक्त  ने हर वक्त ठुकराया अब किस्मत भी तरसाती है सब ख़्वाब हमने जला डाले अब नींद  हर शब आती है तेरे इश्क  के बाद बस तू है   तेरी वहशत मुझे बहलाती है   क्या गिले क्या शिकवे ‘नादाँ’ खाकसारी इतना सिखलाती है

मेरा जेहन-ओ-चेहरा अखबार हो गया

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ये गम-ए-रोजगार से लाचार हो गया मेरा जेहन-ओ-चेहरा अखबार हो गया लादे फिरता हूँ मै जख्म पुरे पीठ पर मिसाल-ए-दोस्ती का किरदार हो गया तरक्की पसंद सरकार  मेरी सरपरस्त अब तो भूख रोज़ का बाज़ार हो गया शौक़ और जरूरत के फासले कम हुए आदमी नियत से ही बीमार हो गया अनार के दरख्त से भरा ये गाँव मेरा कबका नागफनी का तरफदार हो गया अपने किरदार पर गरूर है ’नादाँ’ मुझे दर्पण दिखाने का जो तरफदार हो गया  

कुछ शेर ...............

कुछ शेर ............... तेरी नियत फरेब है मेरी तुझपे ऐतबार देखें ये तिजारत चलती है किस तलक   -- बहुत मुतमईन हूँ मै अपनी बरबादी पर वो सितमगर अपना ही है कोइ गैर नही   -- एक खुली किताब हूँ हर वर्क है यूँ खुला-खुला ,   सब तस्वीरें देखते रहे बस पन्ने पलट-पलट कर --  हमको दिए जख्मों का हिसाब फिर कभी पूछ लेना अभी पूछो दिल में कितनी जगह बेखरोंच बाकी है   --- सर्द तन्हा राहों और वक्त के इम्तहानों के बाद तेरी यादों ने फिर मेरी मंजिल का पता याद किया   --- ये मौसम भी बेइमां है ये हवायें भी कुछ-कुछ देखतें है नकाब तेरी हया रोकेगी कब तलक --- वो दुनिया की बात करते हैं . हम इस दिल की हमारी मंजिल करीब है उनका सफर अभी बाकी --- तुझसा ही यूँ तल्ख मिज़ाजी है शहर तेरा हर ठोकर पर पूछे है कहीं लगी तो नही    ---         मेरे राह की ठोकरे मुझे होश में लाये रखती है मेरी आवारगी मुझे कब होशोहवास आने दिया   ' नादाँ '  बस्तरिया

मजबूर के अश्क का मुद्दा पहले

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हम कुछ नये गम की बात करें मेरे उस हमदम  की बात करें BASTER - Jaynarayan Bastriya  आईना देख क्यूँ पूछती है आँखे क्या इस चश्मेनम की बात करे हर हिजाब के पीछे इक पत्थर किस इक सनम की बात करें जीने का सलीका ज़रा सीख लें फिर हम मरते दम की बात करे मजबूर के अश्क का मुद्दा पहले फिर आबे जमजम की बात करें शिफ़ा अता करना मजबूरी उसकी उससे जरा दम-ख़म से बात करे सियासत जब सैकड़ों सांप सा डसें   किसके जुल्फों ख़म की बात करे 

इस दौरे निजाम में दवा क्या और जहर कैसा

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हमारे लिए यूँ भी  ये रात क्या और दोपहर कैसा आवारा फ़कीर है कोइ गाँव क्या और डगर कैसा चिराग़ है पर यह दोस्ती है आँधियों और तूफानों मुफलिस है हमसे सियासत क्या और जर कैसा jaybastriya वफ़ा के एवज में जफ़ा मुकम्मल करते लोग है हुश्न के इस दौर को गाँव क्या और शहर कैसा यह इस्तफाक है या किस्मत की कारसाज़ी है उजड़ना ही है जब  आँगन क्या और घर कैसा मुफलिसों की लडकी या उजड़े मकां फर्क क्या सियासतदां की नियत क्या और नज़र कैसा मुख्तलिफ़ सी बात है मिरे  सितारें वफ़ा करें इस दौरे निजाम में दवा क्या और जहर कैसा नज़र से गिर के अबके उस दामन में रह गया अश्क हूँ मेरी मंजिल क्या और कोइ सफर कैसा कमबख्त नजर है आशिक की अब सबर क्यूँ फिसल ही गई तो रुख्सार क्या और कमर कैसा