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गीत - ठहर जा, ए मेरे अरमां, अधूरी ये कहानी है...दो

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ठहर जा , ए मेरे अरमां , अधूरी ये कहानी है दिल की सुनाऊं या कहूँ जो ज़ुबानी है सुन सको तो ये किस्सा - ए - वफ़ा तुमको सुनानी है वो नज्म़ या गुल या जैसे डल झील की किश्तियाँ  वो शबाब की वो मस्तियाँ उजडती दिल की बस्तियां बरात - ए - नूर को फर्क क्या किसका घर ये जलता था होते क्या - क्या हादसे , जाने क्या क्या बदलता था नागफनी के बिस्तर में मै करवट बदलता था इस दिल का क्या , बात - बेबात मचलता था  वो कभी आँखे तरेरे है कभी आँखें फेरे है उगते सूरज को वो हांथो से घेरे है करे क्या अभी उसकी , ये चढ़तीं जवानी है ठहर जा , ए मेरे अरमां , अधूरी ये कहानी है 

गीत -- ठहर जा ए मेरे अरमां अधूरी ये कहानी है ..एक

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वो सुखी नदी की बैचेनी , कसमसाता मेरी आँख का पानी है ठहर जा , ए मेरे अरमां , अधूरी ये कहानी है उफ़क से उठती धूल कहती है , ये सूरज सारा दिन उबलता था धुप के सूखे पेशानी में , हर बूंद पल - पल मचलता था वो गुजरे करीब से और मेरा दिल दहलता था इधर बढ़ती थी मजबूरी , उधर वो केशर सा खिलता था कुछ चर्चे कुछ गुफ्तगुं , वो जो चाहे वो मिलता था वो चाल चलता था , सारा शहर हम पे बदलता था दिल की मानु तो तो चुप रहूँ या ये दुनिया को बतानी है ठहर जा , ए मेरे अरमां , अधूरी ये कहानी है  वो झांकती आँखे जुल्फों से , कुछ नेजों नश्तर सी  वो रफ्ता - रफ्ता नज़रे उठाना फिर जम कर बरसना  उनमें कुछ तेज़ाब , कुछ नूर , कुछ सोजें जवानी थी ठहर जा ए मेरे अरमां  अधूरी ये कहानी है 

कविता -- तो क्या देश आजाद हो गया ?

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तथाकथित आजादी के बाद जनता के हित में Bastriya - spider उन्होंने बड़ी ही विरक्ति से जनतांत्रिक होकर नेता बनने का निर्णय लिया आम आदमी, गरीबी, असमानता   जैसे अंतत: प्रसंगों से तटस्थ और असंग होकर युद्ध और शान्ति के मध्य कुर्सी, बैंक और ज़िंदा बोटी का जिन्हें सहारा है: वे सब जो खद्दर की परिभाषा गढ़ते, वे कई दुकानों में महीन खादी तलाशते   भीड़ की भूख को पालतू बनाने पुरे कुनबे के साथ व्यस्त है  अपने शर्म को उलीच तमाम तरह के मुहावरे जब ठंडी खून के भरत पुत्रो के जांघ में रेंगते हो तब  अक्सर मेरे सामने एक प्रश्न खडा होता है गांधी ने चौथे बन्दर के बारे में क्यों नही सोचा ? जिनके पास ताकत थी जिनके पास दाम थे   जिनके पास विचारधाराओं की विष्ठा चांटती भीड़ थी उन सब की बदचलन इच्छाये कुर्सियां बन गयी और ये जयराम पेशा लोकतंत्र उनका पहरेदार तो क्या देश आजाद हो गया ? वो जो उम्मीदों से सर उठाये थे उनकी गर्दन अकड़ गयी जब तब उन्हें कैसे बताऊँ जब लोक चेतना सड़क के क्रमबद्ध गड्ढो की तरह हो तब न्याय आसानी से बाज़ार के ...

कविता - सुभागी (उसे भी पता नही किसने ये नाम रखा )

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नये-नये उभरते महानगर रायपुर की एन एच 5 की ठंडी सड़क अपनी छाती में लिए ८६ लाख की ऑडी S6  कार  पांच सितार होटल से लौटते, देर रात अति सभ्य युवाओ के अतिशालीन असीमित, चुहलबाजियों सहित ओवर ब्रीज के ऊपर से गुजर रही थी वही ओवर ब्रीज के नीचे काले अँधेरे में  14 साल की सुभागी ( पता नही ये नाम किसने रखा ) बस पचास रूपये के संभावना में   पसीने की खट्टी उतस गंध से भरे अधेड़ ऑटो रिक्से वाले के नीचे रौंदी जा रही थी सुभागी ने अभी-अभी  इससे पहले लम्बी सांस ली थी झिल्ली में भरे, थिनर से भीगे रुमाल से दर्द सहने के लिए 20 रूपये का थिनर का खर्च के बाद क्या बचता है उसके पास ? बस कल उसके पास जीने के लिए ऑटो रिक्से वाले के हर धचक के साथ सुभागी का (उसे भी पता नही किसने ये नाम रखा ) उसका वैकल्पिक दुनिया का सपना सुभागी के नीचे बिछे कारटून के तुकडे के नीचे कुचलता जा रहा था  

ग़ज़ल - ना मीना ना मय ना मयनोश की बाते करो

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छत पर चाँद और महफ़िल में वो बेहिजाब उस पर कहते हो हमसे होश की बातें करो उसने दिल लगाया, जलाया एक ही बात है ये जंग-ए-इश्क है हमसे जोश की बातें करो इश्क या परस्तिस के फर्क से नावाफिक है  कौन कहता है, हमसे मदहोश की बातें करो हमने जिया है पुरी शिद्दत, इस दुनिया को ना हमसे कोई नये फिरदोस की बातें करो   माना मदहोश है हम, पर होश की बाते करो ना मीना ना मय ना मयनोश की बाते करो

कविता - मेरी अधुरी इच्छाओं का रोज बदलता चेहरा

मेरी अधुरी इच्छाओं का रोज बदलता चेहरा एक आदमी का नही है जो यातनाओं के खिलाफ मुहं खोल सके लहलहाती हुई नग्न व्यवस्था को तौल सके ना इसमें समाधान की कला है ना यह संघर्ष पर पला है माथे पर पसीना इसके लिए बला है यह तो असंगठित क्षेत्र के मजदुर का वेतन है जो परिवर्तनधर्मी की भुमिका खुल के नही निभा सकता अपनी जात पर कभी   आ नही सकता आने वाले खतरों की गन्ध इसे चैन से जीने नही देती लेकिन बहुत तसल्ली के साथ फुटपाथ पर बिछा भिखारी सा कपड़े पर अपना सम्मान सजा बेच-बाच शिनाख्ती के अभाव में जी-खा लेगा आज तक संघर्ष के नाम पर सिर्फ अपने गले का फंसा बलगम साफ किया हो वही मेरी अधुरी इच्छाओं का बदलता झुलसता चेहरा शहीदो की सूची में पहले .... नाम लिखाने अब ..... वरिष्ठता के लिए आन्दोलन रत है जब भी मौका मिले असली ताकत की असली दवा जेब में रखकर सत्ता नशीनों के साथ मंच पर चढ़कर मुठठ्ठियां हवा में लहरायेगा मंच के नीचे दिहाड़ी पर बुलाये सपाट , मुर्दा चेहरो को तमाम वादों की पाठ पढ़ायेगा साथ-साथ मंच पर बैठे लोगों के भड...

चन्द शेर - 'नादाँ ' बस्तरिया

चन्द शेर हवाओ में बसी जुल्फ की खुशबु हम से परवाने   जान पाते है वो क्या जाने जो खुद के कदमो के आवाज से धोखा खाते है आशिक-ए-आफताबी कर, आशिकी-ए-शबनम खून ठंडा कर देगी हक़-ओ-परस्ती कर, तेरी आवाज-ए-आवाम जुल्म मंदा कर देगी आज उसकी यादो ने हमें फिर रंगीन कर दिया हमने भी अपना दिल जला , खूब मनाई होली | उसने बड़ी बेदर्दी से मेरे दीवानगी को कुछ एहतराम किया बड़ी नफ़ासत से अफ़साना-ए-इश्क से मेरा नाम हटा दिया जुल्फे तेरी बिखर कर जलजला अख्तियार है   नदी को सावन ने जवां किया किसने कहा ये दूर रहकर भी तुम , दिल के कितने करीब हो . ये फ़ासले, ये बेताल्लुकी , सिर्फ दुनियादारी है   इतना आसान नही ये सफ़र तुम साथ चल सको दो कदम साथ चल, तुम भी यूँ रास्ते बदल लोगे जज्बा होना चाहिए ताकत खुदा दे ही देता है   तहे दिल की कोशिशो को वफ़ा दे ही देता है