ग़ज़ल - फर्क क्या मीना साकी कौन मयखाना किसका

ये तिश्नगी ये महफ़िल ये ज़माना किसका फर्क क्या मीना साकी कौन मयखाना किसका जिस मुल्क के हुक्कामों की फितरत फरेब हो फिर कैसे तसल्ली और आजमाना किसका इस राह में दुश्वारियों जब रोजनामचा हो तब छोड़ जाना किसका और निभाना किसका जब राहे इश्क में वफ़ा यूँ मुख़्तसर सी बात हो गैर राह जाना किसका और संग आना किसका मसरुफ़ियत है उनकी जब गैर के महफिल में तब याद करना किसका और भूलजाना किसका