कुछ सुरत मैने सुरत बदली मेरी सीरत तो नही

नाउम्मीद भुख बैचेन सिलसिला हर साँस-साँस जो ये मुफलिसी
वो पुछे है 'नादाँ'  ये बेदर्द  ईद भी  कभी तो हम से पुछ कर आती

जिन्दगी फरेब का दुसरा नाम है  ये हुश्न कुछ ज्यादा ही बदनाम है
रोटी बदले  है रोज ये चेहरे 'नादाँ' अब  दिन-ओ-इमाँ सब बेकाम है

हबीब कौन थे रकीब कौन थे ये कभी इल्म ना हुआ
हर हाँथ के पत्थर 'नादाँ' पूछे थे तेरा मुल्क कौन है

नजर दुर तक जाती है लौट आती है
तेरे जाने की राह है कहीं जाती नही

आवारगी अकेले ही मुनासिब है
हम अकेले ही बदनाम सही

जुनूने आवारगी हद उससे क्यूँ कर पूछे है 
भटकती राहों से 'नादाँ' घर का पता पूछे है

हम तो बेबस दिल की उस दिलदार को सुनाते हैं
आप की काबिलियत है इसे जो शायरी बताते है
 


हर इनायत का मकसद क्या है इस अहद में कहना मुश्किल है
तेरा साया भी 'नादाँ' जब तेरे पीछे जब धूप से बचता फिरता हो


यह दिल बेवजह ही तुझसे मोहब्बत कर बैठा
बेशबब की शरारत  इस "नादाँ" की आदत है


"नादाँ" भी बिकेगा इक काबिल खरीददार तो मिले
दर-ए-इमाँ के मुकाबिल मुकम्मल बाज़ार तो मिले


पूराने यारों की पुरानी चिट्ठीयाँ आज भी ठुंठती है रोज मेरा पता
रोटी को ठुंठती रोजी बेबस ही रोज रोज बदल देती है मेरा पता  



मिजाज-ओ-सुरत पर ये तकरार कैसी "नादाँ"
कुछ सुरत मैने सुरत बदली मेरी सीरत तो नही

कुछ राह कुछ रहनुमा क्या रहजन की खता थी
इश्क का सफर "नादाँ"  कब नफरत से जुदा थी

ख्वाब देखना कभी युँ मेरे हैसियत मे ना रहा है
नींद चैन आराम लूट पुछना कैसे हो ये अदा थी

इन हसीन वादियों में बेहिस पत्थर से है ये लोग
मुझे संगसार किया फिर वही संग चुम रहे लोग

मेरे मिजाज की यूँ भी मत पुछ मेरे यारा
मौसम सा ही ये भी कुछ रूख बदलता है

जयनारायण 'नादाँ' बस्तरिया 

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